
Saturday, August 29, 2009
बेमौसम की होली

Friday, August 14, 2009

Wednesday, August 12, 2009
स्वप्न और देश

पोस्ट नंबर 17
"पर अभी संभावना है"लेखक डॉ. सूर्यपाल सिंह (http://www.purvapar.com/) ई मेल drspsingh@purvapar.com
Monday, August 10, 2009
पर अभी संभावना है

पोस्ट नंबर 16
Saturday, August 8, 2009
मेरा मन
नोट : बेचारा गुनाह हमेशा लावारिस ही होता है।
From the desk of : MAVARK
Sunday, March 22, 2009
चुनाव एक यज्ञ
पोस्ट नंबर 14
चुनाव एक यज्ञ
(सामयिक चर्चा)
चुनाव और हम ब्लॉगर्स की जिम्मेदारी
आज किसको वोट दिया जाए और किसको न दिया जाए, ये एक यक्ष प्रश्न बन गया है। हम कोई सीधा सादा फार्मूला नहीं लगा सकते कि जो ऐसा है उसको वोट दो और जो ऐसा नहीं है उसको वोट न दो। जो इस पार्टी का है उसको वोट दो और जो उस पार्टी का नहीं है उसको वोट न दो। आज का यह सबसे बड़ा बहस का मुद्दा है कि हम किस प्रत्याशी को जिताएं।
हमें अपने गरिमामय राष्ट्र के सदन के लिए जिम्मेदार और विवेकशील सदस्य चाहिएं। हमारे सोमनाथ दादा ने ठीक ही कहा है कि तुम सब लोग इस बार हार जाओगे। उनका तात्पर्य सीधे सीधे सदस्यों की गैर जिम्मेदाराना हरकतों और सदन के गरिमा को कम करने के कारणों से ही रहा होगा। क्योंकि यह श्राप किसी विशेष पार्टी या किसी विशेष सदस्य के नहीं ये सिर्फ उन लोगों के लिए है जिन लोगों ने सदन की गरिमा को घटाया है।
Sunday, March 15, 2009
TEACHER
Wednesday, March 11, 2009
होली
रंगों की सुघड़ रंगोली,
राग भरी कोयल सी बोली
फागुन की मधुर ठिठोली,
प्रेम सृजन समता ममता में,
आओ सब को रंग दूं ,
और मना लूं होली!
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WISHING TO ALL BLOGGERS VERY VERY HAPPY HOLI.
From the desk of : MAVARK
Thursday, March 5, 2009
खून का खुलासा
Wednesday, March 4, 2009
खून
Saturday, February 21, 2009
एक उपन्यास
Tuesday, February 17, 2009
एकाकीमन
- हम सभी हमेशा इस प्रयास में रहते हैं जो हमें नहीं पसंद है उससे मुक्त हो जायें, जिसे हम सुख का कारक नहीं मानते हैं उससे मुक्त हो जायें, जिसका साथ मुझे सुखमय नहीं लगता उससे मुक्त हो जायें। मुक्त होना एक प्रक्रिया है लेकिन ऐसी प्रक्रिया जो होने के साथ पुन: दूसरी प्रतिक्रिया को जन्म दे देती है, तो निश्चय ही हर मुक्ति के पीछे तमाम प्रतिक्रियाओं का जन्म होगा और हम मुक्त किए जाल से छूट कर प्रतिक्रियाओं के नये जाल में जकड़ जायेंगे।
- आज का युवक विद्रोह की राह पर है। पग पग पर विद्रोह उसका सबब बन गया है। घर में विद्रोह, समाज से विद्रोह, व्यवस्था से विद्रोह और यहां तक कि अपने से विद्रोह करने में भी वो गुरेज नहीं करता। विद्रोह का जाल बढ़ता जा रहा है और आज का युवक उसमें उलझता जा रहा है। विद्रोह से न तो कोई समाधान मिलता है और न मुक्ति।
- मुक्ति का उद्भव तभी होता है जब आप सोचते हैं, जब आप देखते हैं और कुछ करते हैं। विद्रोह के द्वारा कदापि नहीं। त्वरित उदाहरण के रूप में जैसे हम किसी खतरे को देखते हैं सोच विचार, बहस विवाद और संशय के बिना तुरंत रक्षा की क्रिया शुरू हो जाती है। इसका अर्थ ये हुआ कि देखना और क्रिया तो मूल है, सोचना तो जब संभव होगा, जब समय होगा। मुक्त होना , एकाकीपन, विद्रोह ये मन की आंतरिक दशाएं हैं जो किसी बाहरी उत्तेजना और किसी ज्ञान पर निर्भर नहीं हैं और न ही किसी अनुभव और निष्कर्ष का प्रतिपाद हैं। हममें से अधिकांश लोग आंतरिक रूप से कभी भी एकाकी नहीं होते। उन्हें एकाकी होने में डर लगता है। उन्हें हमेशा किसी का साथ चाहिए। वैसे भी एकाकी होने के लिए अथाह आत्मविश्वास कीआवश्यकता होती है।
- एकाकी होने में बाधक हैं हमारी स्मृतियां, हमारे संस्कार, बीते हुए कल की तमाम घटनाएं। हमारा मन तो इन सभी बातों से कभी रिक्त ही नहीं हो पाता। तो एकाकी कैसे होगा? वस्तुत: एकाकी होना एक निष्कलुष मन:स्थिति है। निष्कलुष मन:स्थिति, मन को दुखों से मुक्त कर देती है। विद्रोह शांत हो जाता है। भय तिरोहित हो जाता है। हमें एक संपूर्णता का अनुभव होता है। ऐसी संपूर्णता जिसमें न तो अहं है और नही कोई दीनता।
From the desk of : MAVARK
Posted by : MAVARK
Saturday, February 7, 2009
क्षितिज

Monday, February 2, 2009
आपसे दो शब्द
