पोस्ट नंबर 9
एक उपन्यास
ऊंची कोठी, ढेरों दौलत,
बड़ी-बड़ी कारों की शान,
एक नहीं तेरह दरबान,
सबके सब सधे हुये,
मैडम से डरे हुये।
कौन कहां से, क्यों, कब आया,
किसने कैसा रंग जमाया ?
कभी किसी ने जान न पाया,
कोई किसी से पूछ न पाया।
चला कई वर्षों तक धंधा,
लोगों का अनुभव था मंदा।
तभी समय ने करवट बदली,
लोग फिर गये, साये गुम गये।
दरबानों ने बिस्तर बांधे,
कोठी के कुत्तों ने भी,
अपनी अपनी आदत बदली,
गली मोहल्ले में फिर-फिर कर,
लगे चाटने जूठी पतली।
और एक अरसे के बाद,
उसी गली के सारे कुत्ते,
भौंक उठे हो कर खूंखार।
बच्चे भाग चले निज घर में,
चीखें मार मार होकर भय त्रस्त।
लगी बरसने दरवाजों पर,
तभी पत्थरों की बौछार।
मैडम अपनी आज गली में,
नंगी-बौराई घूम रही थी।
From the desk of : MAVARK